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तस्वीर दिखाने आया हूँ

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इंसानों की बस्ती में ये जश्न अधूरे कैसे हैं वीणा की संगीतों में ये राग बेसुरे कैसे हैं राजनीति है, दंगे हैं, हिंसाओं के दौर हुए जीवन की आपाधापी में रिश्ते सारे गौण हुए दूर हो रहा इंसान से इंसान, ये तुम्हें बताने आया हूँ घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ

हमसफर

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गीत मैं गुनगुनाऊँ आज कोई या नज़र तुमको मैं गज़ल कर दूँ चंद लम्हे साथ चलूं मैं तुम्हारे या नाम तेरे हर सफर कर दूँ

तिरंगा हूँ मैं

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इस गरिमामयी धरा का अभिमान हूँ मैं आपकी राष्ट्रीयता का पहचान हूँ मैं न जाने कितने रंगों से रंगा हूँ मैं जी हाँ! ठीक सोचते हैं आप, 'तिरंगा हूँ मैं'

चांद के दीदार

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तुमसे न मिला था कुछ अधूरा सा था मैं अब पूरा हुआ हूँ था थोड़ा सा पागल जो अब पूरा हुआ हूँ नहीं पता है, क्या हुआ है हूँ कौन मैं, भूला हुआ हूँ

मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ

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भारत का ऐक्य जिनको रास नहीं आता सौहार्द-संस्कृति का संस्कार जिनको नहीं भाता जो एक मुँह के भीतर कई चेहरे छिपाए बैठे हैं जो मानवता की अस्मिता पर घात लगाए बैठे हैं इंसानियत को लहुलुहान करना जिनका कारोबार है उन भेड़ियों की मौत ही अब एकमात्र समाधान है