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पच्चीस बछर के छत्तीसगढ़

अप न अस्मिता के सोनहा बिहान के जल, जंगल, जमीन, अउ कर्मठ किसान के गुरतुर बोली-भाखा, अउ हरियर धान के दोस्ती मं बधे महापरसाद अउ मितान के करमा, ददरिया, सुआ, अउ भरथरी के गीत के 'झिट्कू-मिटकी 'अउ 'लोरिक-चंदा' के पिरीत के हरेली, भोजली, करमा परब अउ तिहार के गिरौदपुरी के सत्य संदेस, अउ राजिम दाई के मया-दुलार के रामायण के दक्षिण कोसल, इहां कोसल्या मां के धाम हे आदिवासी पुरातन सभ्यता अउ संस्कृति के अभिमान हे अपन नदिया, मंदिर देवाला, अउ महतारी के मान हे पच्चीस बछर के जवान, ये छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान हे -सूर्यकांत साहू ' सूर्य '

गुरु वंदन

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गुरु ने जलायी ज्ञान की ज्योति जीवन में गुरु ने दिया जीवटता का मंत्र मन में गुरुओं ने किया प्रकाशित इस मानव तन को गुरु ने किया आलोकित अंतर्मन को

स्वच्छता का इंकलाब

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जिस धरती ने हमको आश्रय स्नेह भरपूर दिया उसको बदले में हमने गंदगी का नासूर दिया जिसकी मिट्टी ने हमें अन्न, और पीने को नीर दिया प्रदूषण फैलाकर हमने ही धरती मां का सीना चीर दिया

तिरंगा हूँ मैं

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इस गरिमामयी धरा का अभिमान हूँ मैं आपकी राष्ट्रीयता का पहचान हूँ मैं न जाने कितने रंगों से रंगा हूँ मैं जी हाँ! ठीक सोचते हैं आप, 'तिरंगा हूँ मैं'

मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ

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भारत का ऐक्य जिनको रास नहीं आता सौहार्द-संस्कृति का संस्कार जिनको नहीं भाता जो एक मुँह के भीतर कई चेहरे छिपाए बैठे हैं जो मानवता की अस्मिता पर घात लगाए बैठे हैं इंसानियत को लहुलुहान करना जिनका कारोबार है उन भेड़ियों की मौत ही अब एकमात्र समाधान है

आ गया अगस्त

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उमड़ रहे जज़्बात फिर... आ गया अगस्त है, जश्न-ए-आज़ादी मनाने बेताब हर शख्श है। हर ज़हन वतनपरस्ती, हर ज़बाँ में हिंद, गली गली गूंजने लगे देशभक्ति के गीत।