तिरंगा हूँ मैं
इस गरिमामयी धरा का अभिमान हूँ मैं
आपकी राष्ट्रीयता का पहचान हूँ मैं
न जाने कितने रंगों से रंगा हूँ मैं
जी हाँ! ठीक सोचते हैं आप, 'तिरंगा हूँ मैं'
मेरा केसरिया रंग यहाँ की समृद्धि का प्रतीक है
संस्कारों की इस धरती पर खुशहाली की रीत है
बलिदानों के लिए सदा जो आगे आते हैं
शौर्य - पराक्रम से मेरा मान बढ़ाते हैं
आपकी राष्ट्रीयता का पहचान हूँ मैं
न जाने कितने रंगों से रंगा हूँ मैं
जी हाँ! ठीक सोचते हैं आप, 'तिरंगा हूँ मैं'
मेरा केसरिया रंग यहाँ की समृद्धि का प्रतीक है
संस्कारों की इस धरती पर खुशहाली की रीत है
बलिदानों के लिए सदा जो आगे आते हैं
शौर्य - पराक्रम से मेरा मान बढ़ाते हैं
शांति का संदेश देता है मेरा श्वेत रंग
एक डोर से बंधा है राष्ट्र का हर अंग
प्रेम - सद्भावना का वास है इस धरा पर
'सत्य' का इतिहास है इस धरा पर
हरितिमा से आच्छादित है भारत भूमि
धन - धान्य से आल्हादित है भारत भूमि
कृषि कर्म का यहाँ से, है गहरा संबंध
हरियाली का द्योतक है, मेरा हरा रंग
जिस चोले की ख़ातिर लक्ष्मीबाई ने खड़ग उठाया था
सुभाष ने जिसकी रक्षा के लिए 'आज़ाद हिंद' बनाया था
शहीद होकर भगतसिंह ने 'इंकलाब' को पा लिया
सुखदेव ने भी हँसते हँसते फांसी को गले लगा लिया
न जाने कितने सेनानी अपने जीवन से खेल गए
जिसकी आज़ादी के लिए 'आज़ाद' खुद अपनी गोली झेल गए
सोचता हूँ, क्या मैं वही तिरंगा बोल रहा हूँ
भूत और वर्तमान में खुद को तौल रहा हूँ
इस राष्ट्र के चिंतन में घिरा हुआ हूँ मैं
अपनी अस्मिता के सवाल से डरा हुआ हूँ मैं
ऐतिहासिक कीर्तिमान, क्या केवल अहम है मेरा ?
इस राष्ट्र की पहचान हूँ, या ये वहम है मेरा ?
राजपथ के गलियारों से अधिक आनंद मैं पाता हूँ
जब नन्हे मुन्नों के हाथों में दौड़ भाग लगाता हूँ
कुछ मासूमों के पेट की ख़ातिर चंद रुपयों में बिक जाता हूँ
तब पूंजीवादियों के हाथों खुद को ठगा हुआ पाता हूँ
लिपटा हुआ जब किसी सैनिक संग, उसके घर जाता हूँ
उसके परिवार को उसकी शौर्य गाथा सुनाता हूँ
पर सोचता हूँ कब तक वर्दी वालों का ये अंजाम होगा
सरहदों के नाम पर कब तक ख़ूनी संग्राम होगा
आज मेरे रंगों के मजहबी हैं मायने
कौमी एकता के, सिकुड़ गए हैं दायरे
रंग - जाति - धर्म के आपसी वार में
बेरंग सा, बिखर गया हूँ तार - तार में
ऐसे 'विकास' से भी मुझको ग्लानि होती है
ग़रीबों को भूखे मरते देख हैरानी होती है
समरसता का मंत्र देने वालों को ललकारता हूँ मैं
और ऐसे विकास को धिक्कारता हूँ मैं
मैं सत्ता के टेबलों की महज शोभा नहीं हूँ
खेल - विजय के जश्नों की प्रदर्शनी नहीं हूँ
चंद लम्हों के लिए लहराने वाला कपड़ा नहीं मैं
महज खादी का कोई टुकड़ा नहीं हूँ
इस भीड़ भरे बाजार में स्वरूप खो रहा हूँ मैं
भूत और भविष्य के बीच खड़ा रो रहा हूँ मैं
न जाने कितने रंगों से रंगा हूँ मैं
और 'अशोक चक्र' लिए… 'तिरंगा हूँ मैं'

