हमसफर

गीत मैं गुनगुनाऊँ आज कोई
या नज़र तुमको मैं गज़ल कर दूँ
चंद लम्हे साथ चलूं मैं तुम्हारे
या नाम तेरे हर सफर कर दूँ

कपास सी कोमल और गंगा नीर सी पावन हो तुम
वर्षा में भीगूं मैं जिसकी.. तुम वो सावन हो
अपने अंतर्मन में मैंने तुमको पाया है
न जाने इन सब में खुद को कहां गंवाया है

हो काश यूँ.. इस ज़मीं से आसमां तक
बस तुम कुछ कहो और मैं सुनता रहूँ
तुम वो गीत हो जाओ जिसे मैं गाता रहूँ
ये तुम्हारी खामोशी मुझे बेचैन करती है

इतनी हंसी हो, खुलकर मुस्कुराया भी करो
तुम खुशी हो मेरी... ये तुम्हें इल्म हो
मुस्कान से तुम्हारी, जुड़ी है ज़िंदगी मेरी
गुमसुम से यूँ उदास तुम अच्छे नहीं लगते

तुम रहो पूर्णिमा सी प्रकाशित
या घनी अमावस हो जाओ
काश मैं तुमपर दाग हो जाऊँ
तुम चांद हो.. बेदाग यूँ अच्छे नहीं लगते

चले हैं साथ कुछ, जाना दूर है बाकी
तुम भी मुझको अपना हमसफर कर दो
कहो! मैं गीत ये गुनगुनाता रहूँ
या नज़र तुमको मैं गज़ल कर दूँ।



Popular posts from this blog

स्वप्न यात्रा

जरूरी है

पच्चीस बछर के छत्तीसगढ़