मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ

भारत का ऐक्य जिनको रास नहीं आता
सौहार्द-संस्कृति का संस्कार जिनको नहीं भाता
जो एक मुँह के भीतर कई चेहरे छिपाए बैठे हैं
जो मानवता की अस्मिता पर घात लगाए बैठे हैं
इंसानियत को लहुलुहान करना जिनका कारोबार है
उन भेड़ियों की मौत ही अब एकमात्र समाधान है

चीखों और विलापों का सैलाब बहुत रुलाता है
निर्दोषों पर फ़िदाइनों का वार बहुत तड़पाता है
मैं हर बिखरे परिवार का इंसाफ मांगता हूँ
मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ



जिन जिहादियों ने सारे देश को झुलसाया था
सर न उठा सकने वालों ने तब आँख दिखाया था
कई छातियों को जिसने गोलियों से भेदा था
उस कुत्ते की सुरक्षा में ज़ेड प्लस का घेरा था
अपनों की मौतों का दर्द जो सरकारों ने पहचाना था
तो कसाब को अगले ही दिन फाँसी पर टंग जाना था

मुठभेड़ में गए जवानों के झुक चुके जब बाजू थे
तब हर हिंदुस्तानी की आँखों में आंसू थे
जांबाजों की लथपथ काया का इंसाफ मांगता हूँ
मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ

वो सीमा पार से अब भी छुपकर वार करता है
और यहाँ 'कड़े शब्दों में निंदाओं' का दौर चलता है
अब तो राजनीति के गलियारों से हटकर बात करो
कैंसर के जैसे फैलते इस नासूर का उपचार करो
त्वरित न्याय के लिए जब कोई प्रावधान होगा
तब आतंकवाद की घटनाओं का निदान होगा

जब तक हम भी उसको घुसकर न ललकारेंगे
वो अपने नापाक इरादों से बाज नहीं आएंगे
जान के बदले जान का विधान मांगता हूँ
मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ


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