जो कुछ पढ़ पाता हूं लिख देता हूं कुदरत को जितना पढ़ता हूं, और कौतुक हो जाता हूं पढ़ते पढ़ते इनके पन्ने, इन्हीं में मैं खो जाता हूं और किसी प्रेमी की भांति, बस, इनका ही हो जाता हूं
दुनिया की तलाश उसकी न जाने कब होगी समाप्त मुमकिन है न मिलेगा कोई जिसमें पाए वो गुण पर्याप्त और कब वो थक हारकर अपने आप को जांचेगी न जाने कब इत्मिनान से वो अपने अंदर झांकेगी जाने क्या होगा जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी इस एहसास से जाने वो कितना शरमाएगी