जो कुछ पढ़ पाता हूं लिख देता हूं कुदरत को जितना पढ़ता हूं, और कौतुक हो जाता हूं पढ़ते पढ़ते इनके पन्ने, इन्हीं में मैं खो जाता हूं और किसी प्रेमी की भांति, बस, इनका ही हो जाता हूं
मानसून की कुछ बौछारें आई हैं संग अपने, मिट्टी का श्रृंगार लायी हैं बीजों ने अंकुरित हो, देखा नवजीवन अब आकाश की ओर बढ़ने की तैयारी है जीवन के सूखेपन को तर करने देखो, ये ऋतु वर्षा की आयी है