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स्वच्छता का इंकलाब

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जिस धरती ने हमको आश्रय स्नेह भरपूर दिया उसको बदले में हमने गंदगी का नासूर दिया जिसकी मिट्टी ने हमें अन्न, और पीने को नीर दिया प्रदूषण फैलाकर हमने ही धरती मां का सीना चीर दिया

तस्वीर दिखाने आया हूँ

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इंसानों की बस्ती में ये जश्न अधूरे कैसे हैं वीणा की संगीतों में ये राग बेसुरे कैसे हैं राजनीति है, दंगे हैं, हिंसाओं के दौर हुए जीवन की आपाधापी में रिश्ते सारे गौण हुए दूर हो रहा इंसान से इंसान, ये तुम्हें बताने आया हूँ घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ

मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ

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भारत का ऐक्य जिनको रास नहीं आता सौहार्द-संस्कृति का संस्कार जिनको नहीं भाता जो एक मुँह के भीतर कई चेहरे छिपाए बैठे हैं जो मानवता की अस्मिता पर घात लगाए बैठे हैं इंसानियत को लहुलुहान करना जिनका कारोबार है उन भेड़ियों की मौत ही अब एकमात्र समाधान है

शमशान बहुत बड़ा है

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श्मशान बहुत बड़ा है, भरा पड़ा है शवों से, भाग रहे सब भीड़ में, भिड़कर शव हो रहे। इतनी शाँति है, कि मन होने लगा अशांत, कि श्मशान इतना बड़ा क्यों है?