Posts

Showing posts with the label Signature Poetry

पच्चीस बछर के छत्तीसगढ़

अप न अस्मिता के सोनहा बिहान के जल, जंगल, जमीन, अउ कर्मठ किसान के गुरतुर बोली-भाखा, अउ हरियर धान के दोस्ती मं बधे महापरसाद अउ मितान के करमा, ददरिया, सुआ, अउ भरथरी के गीत के 'झिट्कू-मिटकी 'अउ 'लोरिक-चंदा' के पिरीत के हरेली, भोजली, करमा परब अउ तिहार के गिरौदपुरी के सत्य संदेस, अउ राजिम दाई के मया-दुलार के रामायण के दक्षिण कोसल, इहां कोसल्या मां के धाम हे आदिवासी पुरातन सभ्यता अउ संस्कृति के अभिमान हे अपन नदिया, मंदिर देवाला, अउ महतारी के मान हे पच्चीस बछर के जवान, ये छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान हे -सूर्यकांत साहू ' सूर्य '

जरूरी है

Image
उठो, थोड़ा शांत बैठो झांको खुद के भीतर ये वही समय है ना जिसके, ना मिलने की करते थे शिकायत अक्सर

ज़िंदगी आजकल

Image
  मुफलिसी सी हो गई है ज़िंदगी आजकल भीड़ में कहीं खो गई है ज़िंदगी आजकल

लिख देता हूं

Image
जो कुछ पढ़ पाता हूं लिख देता हूं कुदरत को जितना पढ़ता हूं, और कौतुक हो जाता हूं पढ़ते पढ़ते इनके पन्ने, इन्हीं में मैं खो जाता हूं और किसी प्रेमी की भांति, बस, इनका ही हो जाता हूं

गुरु वंदन

Image
गुरु ने जलायी ज्ञान की ज्योति जीवन में गुरु ने दिया जीवटता का मंत्र मन में गुरुओं ने किया प्रकाशित इस मानव तन को गुरु ने किया आलोकित अंतर्मन को

स्वप्न यात्रा

Image
दुनिया की तलाश उसकी न जाने कब होगी समाप्त मुमकिन है न मिलेगा कोई जिसमें पाए वो गुण पर्याप्त और कब वो थक हारकर अपने आप को जांचेगी न जाने कब इत्मिनान से वो अपने अंदर झांकेगी जाने क्या होगा जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी इस एहसास से जाने वो कितना शरमाएगी

प्रेम गीत

Image
विप्लव राग नहीं गाता मैं गीत प्रेम के लिखता हूं जीवन के अंतर्द्वंद्वों पर नैतिकता के अवमंदन पर

तस्वीर दिखाने आया हूँ

Image
इंसानों की बस्ती में ये जश्न अधूरे कैसे हैं वीणा की संगीतों में ये राग बेसुरे कैसे हैं राजनीति है, दंगे हैं, हिंसाओं के दौर हुए जीवन की आपाधापी में रिश्ते सारे गौण हुए दूर हो रहा इंसान से इंसान, ये तुम्हें बताने आया हूँ घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ

मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ

Image
भारत का ऐक्य जिनको रास नहीं आता सौहार्द-संस्कृति का संस्कार जिनको नहीं भाता जो एक मुँह के भीतर कई चेहरे छिपाए बैठे हैं जो मानवता की अस्मिता पर घात लगाए बैठे हैं इंसानियत को लहुलुहान करना जिनका कारोबार है उन भेड़ियों की मौत ही अब एकमात्र समाधान है

लिखूंगा

Image
कलम उठाया है तो लिखूंगा क्या मेरी पहचान... लिखूंगा रो रहे सपने कई, सो रही सरकार दूर होता इंसान से इंसान... लिखूंगा