तस्वीर दिखाने आया हूँ
इंसानों की बस्ती में ये जश्न अधूरे कैसे हैं
वीणा की संगीतों में ये राग बेसुरे कैसे हैं
राजनीति है, दंगे हैं, हिंसाओं के दौर हुए
जीवन की आपाधापी में रिश्ते सारे गौण हुए
दूर हो रहा इंसान से इंसान, ये तुम्हें बताने आया हूँ
घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ
बंद हुए हैं गुरुकुल, अटी पड़ी हैं मधुशाला
नोटों की प्यास ने आंखों का पानी पी डाला
प्यार सिखाने वाले बस्ते मजहब के स्कूल गए
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गए
एक नया मजहब जन्मा है पूजाघर बदनाम हुए
दंगे कत्लेआम हुए जितने मजहब के नाम हुए
धर्म बड़ा या प्रेम ये प्रश्न पूछने आया हूँ
घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ
कोई अपने प्रिय की लाश स्वयं ढोने मजबूर हुआ
संवेदना शून्य अब समाज क्यों इतना क्रूर हुआ
नारी की इज्जत पर जब सरेराह था वार हुआ
भारत मां का शीश भी तब था शर्मशार हुआ
जागो राजघाट के गांधी तुम्हें जगाने आया हूँ
घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ
जब पंछी के पंखों पर हों पहरे बम के, गोली के
जब पिंजरे में कैद पड़े हों सुर कोयल की बोली के
जब धरती के दामन पर हों दाग लहू की होली के
कोई कैसे गीत सुना दे बिंदिया, कुमकुम, रोली के
अंतर्मन के द्वेष मिटाने का संदेशा लाया हूँ
अंतर्मन के द्वेष मिटाने का संदेशा लाया हूँ
नफरत वाले बंजर में मैं प्यार उगाने आया हूँ
मानव में मानवता का अलख जगाने आया हूँ
घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ।
(This work of poetry was featured on literature event held in my college during Youth Festival)

