चांद के दीदार

तुमसे न मिला था
कुछ अधूरा सा था मैं
अब पूरा हुआ हूँ
था थोड़ा सा पागल जो
अब पूरा हुआ हूँ
नहीं पता है, क्या हुआ है
हूँ कौन मैं, भूला हुआ हूँ

लिखता हूँ मैं अपने
रोज नए अफ़साने
कोई बात भी नहीं है
पर मुस्कुरा रहा हूँ
तुम्हारी यादों के बहाने
नहीं पता है, क्या हुआ है
हूँ कौन मैं, भूला हुआ हूँ

जिस घड़ी तुमसे मिला
थम सी गई जैसे घड़ी
खो गया हूँ खुद में
नासमझ हो गया हूँ
ढूँढ़कर मुझको समझाने चले आओ
नहीं पता है, क्या हुआ है
हूँ कौन मैं, भूला हुआ हूँ

शिकवा हो या शिकायत
करना हो तुमको जो भी
कह दो मैं सुन रहा हूँ
बातों को अब हमारी
मुद्दत सी हो गई है
नहीं पता है, क्या हुआ है
हूँ कौन मैं, भूला हुआ हूँ

'सूर्य' हूँ मैं अपने ही
आग में जलता हूँ
पर अगर किसी अमावस
हो मुलाक़ात अपनी
'चाँद' का मैं अपने
दीदार तब करूँगा
नहीं पता है, क्या हुआ है
हूँ कौन मैं, भूला हुआ हूँ


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