आ गया अगस्त
उमड़ रहे जज़्बात फिर... आ गया अगस्त है,
जश्न-ए-आज़ादी मनाने बेताब हर शख्श है।
हर ज़हन वतनपरस्ती, हर ज़बाँ में हिंद,
गली गली गूंजने लगे देशभक्ति के गीत।
जश्न-ए-आज़ादी मनाने बेताब हर शख्श है।
हर ज़हन वतनपरस्ती, हर ज़बाँ में हिंद,
गली गली गूंजने लगे देशभक्ति के गीत।
याद आए वो परवाने, वो आज़ादी के मस्ताने,
क्या देशभक्ति है, बतलाकर, कर गए जो हमको दीवाने ।
तिरंगे की आन-बान है, क्या निराली इसकी शान,क्या देशभक्ति है, बतलाकर, कर गए जो हमको दीवाने ।
अपनी माटी पर इतराना कैसे, ये हमको भी वो सीखा गए।
उनकी कुर्बानी के एवज हमने पायी आज़ादी,
खुले आसमां में उड़ान जैसे पंछी ने पायी।
उन्मुक्त गगन के तले फिर खेत हरे लहलहा उठे,
विकास के पथ पर बढ़ हर कर फिर साथ उठे।
खुले आसमां में उड़ान जैसे पंछी ने पायी।
उन्मुक्त गगन के तले फिर खेत हरे लहलहा उठे,
विकास के पथ पर बढ़ हर कर फिर साथ उठे।
हरित क्रांति लाकर हमने, कोटि जन का अन्न जुटाया।
'पृथ्वी', 'अग्नि', और 'त्रिशूल' से अपना शास्त्रागार सजाया है।
'ग्यान-विग्यान' के आविष्कारों से हमने परचम लहराया है,
बैर किसी से नहीं, सदा सबको गले लगाया है।
'पृथ्वी', 'अग्नि', और 'त्रिशूल' से अपना शास्त्रागार सजाया है।
'ग्यान-विग्यान' के आविष्कारों से हमने परचम लहराया है,
बैर किसी से नहीं, सदा सबको गले लगाया है।
देश रहा बढ़ता, पर जाने हम कैसे भटक गए,
फिर जात-पात में हम उलझे, धर्म-भेद हैं अनसुलझे,
यहाँ राजनीति के दंगे हैं, कहीं हैं विधान बदले।
बदले आज़ादी के मायने, जड़ विचार न बदल सके।
फिर जात-पात में हम उलझे, धर्म-भेद हैं अनसुलझे,
यहाँ राजनीति के दंगे हैं, कहीं हैं विधान बदले।
बदले आज़ादी के मायने, जड़ विचार न बदल सके।
स्वतंत्रता का कोई हमको नया अर्थ अब रचना है,
मन से, हो विचारों की, सबका जिसमें सम्मान निहित,
हमें ऐसी आज़ादी चाहिए, तब तमस दूर हो जाएगा..
वरना 'सूर्य' समय तो फिर से यही अगस्त दोहराएगा।
मन से, हो विचारों की, सबका जिसमें सम्मान निहित,
हमें ऐसी आज़ादी चाहिए, तब तमस दूर हो जाएगा..
वरना 'सूर्य' समय तो फिर से यही अगस्त दोहराएगा।