लिखूंगा

कलम उठाया है तो लिखूंगा
क्या मेरी पहचान... लिखूंगा
रो रहे सपने कई, सो रही सरकार
दूर होता इंसान से इंसान... लिखूंगा

न लिख सकूं श्रृंगार की... तो कोई गम नहीं
न लिख किसी महान का गान सकूंगा
जब रो रहा हो भूख से फुटपाथ पर इंसान
सो रहा कैसे इसका जिम्मेदार... लिखूंगा

चहुँ ओर अशांति है, मूक हुआ कानून
गलियाँ दहली दंगों से, कस्बे पसरे खून
शहर शहर फैली सत्ता की आग... लिखूंगा
आँच आई इंसानियत पर क्यों... पूछूँगा

फूंकी जाती बेटी कहीं, कहीं दुर्गा पूजी जाती
क्यों दो तस्वीरें एक चित्र में... लिखूंगा
विलासिता किसी नगर, कहीं भूखमरी
वजहें चाहे जो भी हों... ढूँढूँगा

बेचैनी है कोठी में भी, कोई बेघर मस्त है
हर जीवन के मायने बदलते... लिखूंगा
सवाल है ज़हन में, जो बेसब्री कलम में
सब कुछ, है जो इस मन में... लिखूंगा

निराशा के दौर में 'सूर्य' एक आशावादी
भारतवर्ष के बदलते आयाम लिखूंगा
हिंद हूँ, हिंदी-राष्ट्र का अभिमानी
हो सके तो एक नया राष्ट्रगान लिखूंगा

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