शमशान बहुत बड़ा है

श्मशान बहुत बड़ा है, भरा पड़ा है शवों से,
भाग रहे सब भीड़ में, भिड़कर शव हो रहे।
इतनी शाँति है, कि मन होने लगा अशांत,
कि श्मशान इतना बड़ा क्यों है?

जब दफ़न हो रही इंसानियत, फिर सिर्फ तन क्यों दागे जा रहे,
ज़हन शून्य हैं, खुद राहें भी करने लगी गुमराह,
जज़्बात हुए निर्जीव यहाँ, फिर क्या सोच रहा यह शव...
कि श्मशान इतना बड़ा क्यों है?
सोचने का वक्त नहीं है इस भागती-दौड़ती दुनिया में,
बस जीतने की चाह है, पर मंजिल फिर श्मशान है।
ज़िंदगी की तलाश में ही ज़िंदगी गुज़ार दी, फिर
सोचते हैं कि श्मशान इतना बड़ा क्यों है!
अपने सुख की ख़ातिर प्रकृति को हमने रूलाया है,
अब सिसक रही है धरती माँ, जिसे हमने भूकंप बतलाया है।
हिम पर जलधाराओं को बांधकर स्वयं प्रलय को पुकारा है,
अब सोचते हैं कि श्मशान इतना बड़ा क्यों है?
बस सोचने का फेर है, लेकिन अब श्मशान छोटा हो,
तन में प्राण, मन में इंसान और हर राही हमराह बने।
भीड़ भिड़े ना और सोच हो सार्थक... वरना
श्मशान बहुत बड़ा है।

'सूर्य' के यह मुक्तक समर्पित हैं, भीड़ में चलते हर चिंतनहीन जन को...
यह चिंतन का विषय है कि 'प्राकृतिक आपदाएँ' क्या वास्तव में प्राकृतिक हैं? या परिणाम हैं हमारे ही कृत्यों का? प्रकृति, जिसकी शरण में हम जीवित हैं, आज अपने स्वार्थ के लिये हम इसका अतिदोहन करने लगे हैं…
हिमालय में बढ़ते मानवीय क़दमों ने बर्फ़ीली वादियों को अशांत किया है। नदियों के किनारों पर बसकर इन्हें नालों में तब्दील कर दिया गया।
जानकार मानते हैं, कि जलधाराओं पर बने बांधों से रिसते जल ने हिमालय के भूगर्भ की तपन को बढाया है... हम विकास तो कर रहे हैं, लेकिन किन शर्तों पर?
उत्तराखंड और नेपाल की घटनाएं तो केवल चेतावनी हैं। परंतु यदि अब चिंतन नहीं किया गया तो चलते फिरते शव (हम) भी मौन हो जाएंगे… और श्मशान भी बढता रहेगा।
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