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Showing posts from 2015

मुंबई के हर ज़ख्मों का हिसाब मांगता हूँ

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भारत का ऐक्य जिनको रास नहीं आता सौहार्द-संस्कृति का संस्कार जिनको नहीं भाता जो एक मुँह के भीतर कई चेहरे छिपाए बैठे हैं जो मानवता की अस्मिता पर घात लगाए बैठे हैं इंसानियत को लहुलुहान करना जिनका कारोबार है उन भेड़ियों की मौत ही अब एकमात्र समाधान है

शमशान बहुत बड़ा है

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श्मशान बहुत बड़ा है, भरा पड़ा है शवों से, भाग रहे सब भीड़ में, भिड़कर शव हो रहे। इतनी शाँति है, कि मन होने लगा अशांत, कि श्मशान इतना बड़ा क्यों है?

आ गया अगस्त

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उमड़ रहे जज़्बात फिर... आ गया अगस्त है, जश्न-ए-आज़ादी मनाने बेताब हर शख्श है। हर ज़हन वतनपरस्ती, हर ज़बाँ में हिंद, गली गली गूंजने लगे देशभक्ति के गीत।

लिखूंगा

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कलम उठाया है तो लिखूंगा क्या मेरी पहचान... लिखूंगा रो रहे सपने कई, सो रही सरकार दूर होता इंसान से इंसान... लिखूंगा