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स्वप्न यात्रा

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दुनिया की तलाश उसकी न जाने कब होगी समाप्त मुमकिन है न मिलेगा कोई जिसमें पाए वो गुण पर्याप्त और कब वो थक हारकर अपने आप को जांचेगी न जाने कब इत्मिनान से वो अपने अंदर झांकेगी जाने क्या होगा जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी इस एहसास से जाने वो कितना शरमाएगी

प्रेम गीत

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विप्लव राग नहीं गाता मैं गीत प्रेम के लिखता हूं जीवन के अंतर्द्वंद्वों पर नैतिकता के अवमंदन पर

तुम्हारी यादें

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तुम्हारी यादों का आना.. जैसे कोई और ही दुनिया है नहीं कोई और दूर-दूर तक जहां साथ-साथ चल रहे हों दोनों वहां यथार्थ जहां अस्तित्वहीन हो चले बस.. इसी दुनिया में अपना मन रमे

स्वच्छता का इंकलाब

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जिस धरती ने हमको आश्रय स्नेह भरपूर दिया उसको बदले में हमने गंदगी का नासूर दिया जिसकी मिट्टी ने हमें अन्न, और पीने को नीर दिया प्रदूषण फैलाकर हमने ही धरती मां का सीना चीर दिया

मैं खुद को कहां ढूंढूं

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मैं खुद को कहां ढूंढूं मैं तो समाया तुझमें हूं क्या ज़माने की खबर अब मैं कहां खुद में हूं