तुम्हारी यादें
तुम्हारी यादों का आना.. जैसे
कोई और ही दुनिया है
नहीं कोई और दूर-दूर तक जहां
साथ-साथ चल रहे हों दोनों वहां
यथार्थ जहां अस्तित्वहीन हो चले
एक ही एहसास से लगे.. जैसे
मरूथल में सावन झूमे
ठंडी लहरों से रोमांचित हुआ मन
फुहारों में भीगा, तरंगित हुआ तन
मखमल से मुलायम, पाषाण लग रहे हैं
खिले खिले से सारे बागान लग रहे हैं
एकांत सी धरा में.. जैसे
हलचल सी हो रही है
रेत के घरोंदों को लहरें भिगो रही हैं
एकांत भी यादों से गुलजार हो उठा है
तुम्हारी वाणी का सरगम फिज़ा में घुला है
इसी तार से तो हमारा मन जुड़ा है
जीवन के लेख में, लगे.. जैसे
शब्दों की सार्थकता तुमसे है
शब्दों का टुकड़ा हूं मैं, मेरी कविता हो तुम
मेरे गीतों की धुन तुम, तुम्हीं अलंकार हो
भ्रम हो, या सच हो तुम.. पर मेरा साथ दो


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