मैं खुद को कहां ढूंढूं

मैं खुद को कहां ढूंढूं
मैं तो समाया तुझमें हूं
क्या ज़माने की खबर अब
मैं कहां खुद में हूं

थी एक वीरानी सी जो दिल में
तेरे जिक्र से गुलजार हुए
हसरत जो थे ज़माने से
तुझसे पूरे अरमान हुए

तुम मिले हो ऐसे जैसे
गुल को मिला सुगंध है
तुम्हारे अल्फाजों के झंकार से
तरंगित हुआ ये मन है

खुशनसीब हूं किस कदर
क्या बतलाऊं तुम्हें मैं
दो जहां ने कबूली है,
तुम वो इबादत हो

ये रास्ता लगता हसीं है
तुम मेरे जब हमसफ़र हो
अब मंजिल की चाह नहीं
बस साथ तेरा हर सफर हो

जो कुछ मेरा अब मुझमें है
वो भी तो जुड़ा अब तुमसे है
कुछ और नहीं अच्छा लगता
ये दिल जुड़ा जब से तुमसे है

मेरे एहसासों में हो तुम
नहीं बीच हमारे कोई दूरी
पर अधूरे से हैं ये,
इन सांसों को तुम जरूरी

कितनी लंबी लगने लगी ये
तुम्हारी यादों की रातें
आ जाओ, मुझमें मिल जाओ
और नयी सहर कर दो

बेसुध हो गया है ये
दिल बेसबर सा है
आकर पुकार लो मुझको
और मुझे खबर कर दो

मैं खुद को कहां ढूंढूं
मैं तो समाया तुझमें हूं
क्या ज़माने की खबर अब
मैं कहां खुद में हूं

Comments

Popular posts from this blog

स्वप्न यात्रा

जरूरी है

पच्चीस बछर के छत्तीसगढ़