जिस धरती ने हमको आश्रय स्नेह भरपूर दिया उसको बदले में हमने गंदगी का नासूर दिया जिसकी मिट्टी ने हमें अन्न, और पीने को नीर दिया प्रदूषण फैलाकर हमने ही धरती मां का सीना चीर दिया
इंसानों की बस्ती में ये जश्न अधूरे कैसे हैं वीणा की संगीतों में ये राग बेसुरे कैसे हैं राजनीति है, दंगे हैं, हिंसाओं के दौर हुए जीवन की आपाधापी में रिश्ते सारे गौण हुए दूर हो रहा इंसान से इंसान, ये तुम्हें बताने आया हूँ घायल मानवता की तस्वीर दिखाने आया हूँ