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जरूरी है

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उठो, थोड़ा शांत बैठो झांको खुद के भीतर ये वही समय है ना जिसके, ना मिलने की करते थे शिकायत अक्सर

ज़िंदगी आजकल

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  मुफलिसी सी हो गई है ज़िंदगी आजकल भीड़ में कहीं खो गई है ज़िंदगी आजकल

लिख देता हूं

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जो कुछ पढ़ पाता हूं लिख देता हूं कुदरत को जितना पढ़ता हूं, और कौतुक हो जाता हूं पढ़ते पढ़ते इनके पन्ने, इन्हीं में मैं खो जाता हूं और किसी प्रेमी की भांति, बस, इनका ही हो जाता हूं

गुरु वंदन

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गुरु ने जलायी ज्ञान की ज्योति जीवन में गुरु ने दिया जीवटता का मंत्र मन में गुरुओं ने किया प्रकाशित इस मानव तन को गुरु ने किया आलोकित अंतर्मन को

ऋतु वर्षा की आयी है

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मानसून की कुछ बौछारें आई हैं संग अपने, मिट्टी का श्रृंगार लायी हैं बीजों ने अंकुरित हो, देखा नवजीवन अब आकाश की ओर बढ़ने की तैयारी है जीवन के सूखेपन को तर करने देखो, ये ऋतु वर्षा की आयी है