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लिख देता हूं

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जो कुछ पढ़ पाता हूं लिख देता हूं कुदरत को जितना पढ़ता हूं, और कौतुक हो जाता हूं पढ़ते पढ़ते इनके पन्ने, इन्हीं में मैं खो जाता हूं और किसी प्रेमी की भांति, बस, इनका ही हो जाता हूं

गुरु वंदन

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गुरु ने जलायी ज्ञान की ज्योति जीवन में गुरु ने दिया जीवटता का मंत्र मन में गुरुओं ने किया प्रकाशित इस मानव तन को गुरु ने किया आलोकित अंतर्मन को

ऋतु वर्षा की आयी है

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मानसून की कुछ बौछारें आई हैं संग अपने, मिट्टी का श्रृंगार लायी हैं बीजों ने अंकुरित हो, देखा नवजीवन अब आकाश की ओर बढ़ने की तैयारी है जीवन के सूखेपन को तर करने देखो, ये ऋतु वर्षा की आयी है

स्वप्न यात्रा

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दुनिया की तलाश उसकी न जाने कब होगी समाप्त मुमकिन है न मिलेगा कोई जिसमें पाए वो गुण पर्याप्त और कब वो थक हारकर अपने आप को जांचेगी न जाने कब इत्मिनान से वो अपने अंदर झांकेगी जाने क्या होगा जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी इस एहसास से जाने वो कितना शरमाएगी

प्रेम गीत

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विप्लव राग नहीं गाता मैं गीत प्रेम के लिखता हूं जीवन के अंतर्द्वंद्वों पर नैतिकता के अवमंदन पर