मानसून की कुछ बौछारें आई हैं संग अपने, मिट्टी का श्रृंगार लायी हैं बीजों ने अंकुरित हो, देखा नवजीवन अब आकाश की ओर बढ़ने की तैयारी है जीवन के सूखेपन को तर करने देखो, ये ऋतु वर्षा की आयी है
दुनिया की तलाश उसकी न जाने कब होगी समाप्त मुमकिन है न मिलेगा कोई जिसमें पाए वो गुण पर्याप्त और कब वो थक हारकर अपने आप को जांचेगी न जाने कब इत्मिनान से वो अपने अंदर झांकेगी जाने क्या होगा जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी इस एहसास से जाने वो कितना शरमाएगी