पच्चीस बछर के छत्तीसगढ़
अपन अस्मिता के सोनहा बिहान के
जल, जंगल, जमीन, अउ कर्मठ किसान के
गुरतुर बोली-भाखा, अउ हरियर धान के
दोस्ती मं बधे महापरसाद अउ मितान के
करमा, ददरिया, सुआ, अउ भरथरी के गीत के
'झिट्कू-मिटकी 'अउ 'लोरिक-चंदा' के पिरीत के
हरेली, भोजली, करमा परब अउ तिहार के
गिरौदपुरी के सत्य संदेस, अउ राजिम दाई के मया-दुलार के
रामायण के दक्षिण कोसल, इहां कोसल्या मां के धाम हे
आदिवासी पुरातन सभ्यता अउ संस्कृति के अभिमान हे
अपन नदिया, मंदिर देवाला, अउ महतारी के मान हे
पच्चीस बछर के जवान, ये छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान हे
-सूर्यकांत साहू 'सूर्य'
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