ज़िंदगी आजकल
दूर तलक दिखती नहीं प्रकाश की कोई किरण
तिमिर के नाम हो गई है ज़िंदगी आजकल
ज़ख्म हैं कई और मरहम नहीं है कोई
नासूर बन गई है ज़िंदगी आजकल
कोई साथी नहीं सुनने को दर्द हमारा
बेचैन छटपटाती है ज़िंदगी आजकल
सांसों का साथ है तो जी रहे हैं
पर ज़िंदगी सी नहीं है ज़िंदगी आजकल
वक्त ठहरता नहीं, ये कहते हैं लोग
पर थम सी गयी है ये ज़िंदगी आजकल
अब होगी भोर और अंधेरे की रवानी
इस आस के साथ है ये ज़िंदगी आजकल
- सूर्यकांत साहू 'सूर्य'
(16 April 2021)

Ye jo urdu aur hindi ka mishran tha... Sahayata swaad hi aa gaya..,
ReplyDeleteBahut khoob
👍🏻👍🏻
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