जरूरी है
उठो, थोड़ा शांत बैठो
झांको खुद के भीतर
ये वही समय है ना
जिसके, ना मिलने की
जिसके पीछे भागते थे,
आज ये वही है अवसर
शांत-चित्त हो बैठो,
न अधिक कोई यत्न करो
स्वयं को खोजने का प्रयत्न करो
तुमने दुनिया बहुत देख ली
भीतर भी तो चरण करो
खुद ही खुद का करो सामना
और शंकाओं का शमन करो
बहुतों का साथ दिया तुमने पर
पाया किसका, कितना साथ
कौन पराया, अपना कौन
अंतस में तुम मनन करो
सबकी करके थके अहो!
हां, करो, अब अपनी जतन करो
याद करो पिछली बार
कब खुद से की थी बात
स्वयं से रख सरोकार,
बाकी सबको करके गौण,
पल भर के लिए, हो मौन,
अपनी उपलब्धि पर खुश हुए
या किसी गलती के लिए,
जी भर खुद को लिया कोस
अपने अंतर्द्वंद्वों से जो जीत जाओगे
तब बालक की सी नींद पाओगे
कृत्यों की आत्म-ग्लानि से
कब जी भर तुम रोये थे
या बचपन की यादों संग
कब नन्हे-पन में खोए थे
आखिरी बार कब तुमने
मनचाही मिठाई मंगाई थी
छुट्टी वाली शाम को कब
अपनी पसंदीदा फिल्म चलाई थी
आखिरी बार कब थे तुम हर्ष में, उत्कर्ष में
ऐसे प्रश्नों में, या उनके निष्कर्ष में
तुम तो लगे रहे, होड़ में
आपाधापी में, दौड़ में
औरों को खुश करने में,
अपने 'स्व' की भी की हानि
अपने हठ में तो तुमने
अपने मन की भी न मानी
आत्म आकलन करना तुम
स्मृति संकलन करना तुम
क्या कोई मजबूरी है?
नहीं, अपना जीवन सर्वोपरि है
प्रश्न स्वयं से करना तुम,
और लाभ हानि का करना तोल
मन की शांति का आखिर में
होगा सबसे ज्यादा मोल
अच्छे-बुरे का फेर चाहे
इस दुनिया का खेल
तुम्हें कोई नहीं समझाएगा
बैठ अकेले, तुम करना चिंतन,
आज नहीं तो कल जीवन का,
भेद समझ में आएगा
समय निकालकर अपने लिए
बैठना जरूरी है
मन की, कर्मों की, विचारों की
विवेचना जरूरी है
सामाजिक व्यवहारों का
आचरण भी जरूरी है
पर भीतर पसरे प्रश्नों का
निराकरण भी जरूरी है
मन रूपी उपवन में 'सूर्य'
भ्रमण जरूरी है
-सूर्यकांत साहू 'सूर्य'
(17 अप्रैल 2021)

Man rupi upvan me surya bhraman jaruri hai
ReplyDeleteWaah waah waah waah 👏👏👏👏
धन्यवाद!! विवेक🙏🏼
Delete👏👏👌👌
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