लिख देता हूं

जो कुछ पढ़ पाता हूं
लिख देता हूं

कुदरत को जितना पढ़ता हूं,
और कौतुक हो जाता हूं
पढ़ते पढ़ते इनके पन्ने,
इन्हीं में मैं खो जाता हूं
और किसी प्रेमी की भांति,
बस, इनका ही हो जाता हूं

प्रकृति से प्रेम हो चला
इनकी कोमलता भाती है
इनकी अति मोहक हरियाली
आंखों को सुहाती है
इनके सौंदर्य सम्मोहन में
आसिक्त सा हो जाता हूं

ये झरने, बादल, नदियां,
ये तितली, पतंगें, कलियां
प्रकृति का अंग हैं ये
मेरे अंतस का उमंग हैं ये
जीवन में इनके उन्मीलन से
स्वच्छंद सा हो जाता हूं

कुदरत के शीतल आंचल में,
प्राणों को आयाम मिला है
ताज़ी और उन्मुक्त हवा में,
तन मन को आराम मिला है
आलिंगन से इनके मैं
इनके करीब सा हो जाता हूं

वन इनके, पशुओं का आश्रय
पक्षियों का यहीं बसेरा
चीतल से लेकर जंगल-नरेश का
लगता यहीं है डेरा
संपूर्ण जीवों के जीवन को
प्रकृति में जीवंत पाता हूं

पंछी के कलरव में,
प्रवाहिनी के कलकल में,
वृक्ष-शाखाओं की हलचल में,
एक निरंतर संगीत है
इनके रागों की रागिनी में
सम्मोहित सा हो जाता हूं

दूर दुनिया की दुनियादारी से,
इनके बीच सुकून है
इनके कण कण का सम्मोहन,
इनके सौंदर्य का मूल है
इनकी धाराओं में जितना बहूं,
उतना बहते ही जाता हूं

प्रकृति के इस जीवन-पन को
हरे-भरे इनके उपवन को
इनके यौवन के हर छुअन को
जितना मैं समझ पाता हूं,
लिख देता हूं मैं उतना, पर शायद
वर्णन नहीं कर पाता पूरा

पशु-पक्षियों के महकमे में
बादलों के गरजने में
इनकी हवाओं में, आब में,
और हरियाली की किताब में, से
जो कुछ पढ़ पाता हूं
लिख देता हूं

-सूर्यकांत साहू
   (27/07/2019)

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