स्वप्न यात्रा
दुनिया की तलाश उसकी न जाने कब होगी समाप्त
मुमकिन है न मिलेगा कोई जिसमें पाए वो गुण पर्याप्त
और कब वो थक हारकर अपने आप को जांचेगी
न जाने कब इत्मिनान से वो अपने अंदर झांकेगी
जाने क्या होगा जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी
इस एहसास से जाने वो कितना शरमाएगी
उसको शायद ये मालूम नहीं होगा अब तक
मैं खुद में कम और उसमें उससे कहीं ज्यादा हूं
हां ये भी सच है कि मैं भी उसके बिना हूं अपूर्ण
उसको ये बतलाए कोई कि वो मुझको करती संपूर्ण
जाने कैसे मेरे अंदर के अंधकार में वो दैदीप्यमान है
मेरे अंतर्मन में वो मधुर संगीत बन गुंजायमान है
मैं उसके जारी तलाश का पूर्ण विराम हूं
चंचल उसकी आंखों का मैं ही नयनाभिराम हूं
उसके टुकड़े शब्दों का सार्थक वाक्य हूं मैं
उसके विविधात्मक प्रश्नों का उत्तर ऐक्य हूं मैं
उसकी सारी समस्याओं का मैं निराकरण हूं
शारीरिक ढांचे में उसके मैं उसका अंतःकरण हूं
मेरे अंधेरे में प्रसारित वो अनंत विकिरण है
जड़ता को मेरे चीरती, चेतना का संचारण है
दीपोत्सव है वो मेरे भीतर पसरे तिमिर का
अलाव की लौ बन करे निवारण मेरे अकड़न भरे शिशिर का
मेरे हर शब्दों के अर्थों में वो ही, वो मेरी गाथा का सार है
मैं तो एक पात्र मात्र हूं, वो इस जीवन की सूत्रधार है
इन अधूरे एहसासों को जाने वो कब पूर्णता देगी
आशंकाओं से भरे मेरे स्वप्नों को कब प्रामाणिकता देगी
मैं पथिक हूं, इस यात्रा में वो मेरी सहयात्री है
क्या वो भी ये महसूस करेगी, जाने कब साथ चलेगी
लिखता हूं मैं रोज अधूरे, ये पन्ने रोज मिटाता हूं
इस पटकथा में अपनी भूमिका, जाने वो कब स्वीकार करेगी
जीवन के इस वसंत में, आखिर कब तक जग में
मेरी हमराही भटकेगी असमंजस में पग - पग में
इस आभास से भर, जाने क्या होंगे उसके एहसास
कि मेरी हर हंसी उससे, और खुशी उसी में है
बाहर बेरंग दुनिया से मुरझाकर जब वो अपने अंदर झांकेगी
खिल उठेगा उसका रोम - रोम जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी
मुझसे मिलकर उसके हृदय निश्चय ही झंकार भरेंगे
निश्छल मुस्कानों वाले स्वरूप फिर लज्जा का श्रृंगार करेंगे
मेरे इस अधूरेपन में संपूर्णता की मुहर लगाएगी
अपने हृदय - दर्पण में वो मेरा स्पंदन सुन पाएंगी
शायद फिर वो मुझसे मिलने दौड़ी - दौड़ी आएगी
किसी पहर जब किसी दिवस वो ये संदेसा पाएगी
-सूर्यकांत साहू 'सूर्य'
(17 अप्रैल 2019)
मुमकिन है न मिलेगा कोई जिसमें पाए वो गुण पर्याप्त
और कब वो थक हारकर अपने आप को जांचेगी
न जाने कब इत्मिनान से वो अपने अंदर झांकेगी
जाने क्या होगा जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी
इस एहसास से जाने वो कितना शरमाएगी
उसको शायद ये मालूम नहीं होगा अब तक
मैं खुद में कम और उसमें उससे कहीं ज्यादा हूं
हां ये भी सच है कि मैं भी उसके बिना हूं अपूर्ण
उसको ये बतलाए कोई कि वो मुझको करती संपूर्ण
जाने कैसे मेरे अंदर के अंधकार में वो दैदीप्यमान है
मेरे अंतर्मन में वो मधुर संगीत बन गुंजायमान है
मैं उसके जारी तलाश का पूर्ण विराम हूं
चंचल उसकी आंखों का मैं ही नयनाभिराम हूं
उसके टुकड़े शब्दों का सार्थक वाक्य हूं मैं
उसके विविधात्मक प्रश्नों का उत्तर ऐक्य हूं मैं
उसकी सारी समस्याओं का मैं निराकरण हूं
शारीरिक ढांचे में उसके मैं उसका अंतःकरण हूं
मेरे अंधेरे में प्रसारित वो अनंत विकिरण है
जड़ता को मेरे चीरती, चेतना का संचारण है
दीपोत्सव है वो मेरे भीतर पसरे तिमिर का
अलाव की लौ बन करे निवारण मेरे अकड़न भरे शिशिर का
मेरे हर शब्दों के अर्थों में वो ही, वो मेरी गाथा का सार है
मैं तो एक पात्र मात्र हूं, वो इस जीवन की सूत्रधार है
इन अधूरे एहसासों को जाने वो कब पूर्णता देगी
आशंकाओं से भरे मेरे स्वप्नों को कब प्रामाणिकता देगी
मैं पथिक हूं, इस यात्रा में वो मेरी सहयात्री है
क्या वो भी ये महसूस करेगी, जाने कब साथ चलेगी
लिखता हूं मैं रोज अधूरे, ये पन्ने रोज मिटाता हूं
इस पटकथा में अपनी भूमिका, जाने वो कब स्वीकार करेगी
जीवन के इस वसंत में, आखिर कब तक जग में
मेरी हमराही भटकेगी असमंजस में पग - पग में
इस आभास से भर, जाने क्या होंगे उसके एहसास
कि मेरी हर हंसी उससे, और खुशी उसी में है
बाहर बेरंग दुनिया से मुरझाकर जब वो अपने अंदर झांकेगी
खिल उठेगा उसका रोम - रोम जब वो मुझको स्वयं के भीतर पाएगी
मुझसे मिलकर उसके हृदय निश्चय ही झंकार भरेंगे
निश्छल मुस्कानों वाले स्वरूप फिर लज्जा का श्रृंगार करेंगे
मेरे इस अधूरेपन में संपूर्णता की मुहर लगाएगी
अपने हृदय - दर्पण में वो मेरा स्पंदन सुन पाएंगी
शायद फिर वो मुझसे मिलने दौड़ी - दौड़ी आएगी
किसी पहर जब किसी दिवस वो ये संदेसा पाएगी
-सूर्यकांत साहू 'सूर्य'
(17 अप्रैल 2019)

Waah
ReplyDeleteaapki Rachna mujhe Hindi se jodati hai
Adbhut... Apratim...
Awsome 👍
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