प्रेम गीत

विप्लव राग नहीं गाता मैं
गीत प्रेम के लिखता हूं

जीवन के अंतर्द्वंद्वों पर
नैतिकता के अवमंदन पर
सामाजिकता के क्रंदन पर
परिवर्तन की मशाल लिए

     आंखों में अंगार लिए
     मैं बात प्रीत की करता हूं
     इस युग में लाए क्रांति जो, वो
     गीत प्रेम के लिखता हूं

स्वर केशव से, शब्द राधिका,
संगीत हृदय से लेकर
नूतन गीत सृजन की ओर
पग दर पग मैं बढ़ता हूं

     लय - ताल की समझ नहीं मुझको
     ना रस, छन्दों का ज्ञान ही
     सांसों को स्वर जो तर कर दे, वो
     गीत प्रेम के लिखता हूं

सीख रहा हूं विषमता में
राग कौन सा अपनाऊं
मतभेदों के दलदल में
कैसे पंकज सा खिल पाऊं

     सांसारिक कोलाहल में भी
     जो शांति का पर्याय है
     संस्कारों से संगीतबद्ध जो, वो
     गीत प्रेम के लिखता हूं

गीत मेरे इस अंतर्मन की,
हरियाली की, वन - उपवन की
शुरू हुई जो एक यात्रा,
तन-मन के इस नूतनपन की

     शब्द भले ही कम पड़ जाएं
     भावों का ह्रास नहीं करता
     सुख अनुभूति का चरम हो जो, वो
     गीत प्रेम के लिखता हूं

सद्भावों का कलम लगाता
प्रीत का सींचन करता हूं
विप्लव राग नहीं गाता मैं
गीत प्रेम के लिखता हूं



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